गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

यह देश जिन्दा रहेगा तो धरती पर मानवता जिन्दा रहेगी।
जो लोग अपने देश और धर्म पर बलिदान दे देते हैं, क्या उन्हें अपने जीवन के मूल्य का अनुमान नहीं होता? वास्तव में जो अपने आदर्शों के लिए जीवन की आहुति दे देते हैं, जीवन का मूल्य तो वही जानते हैं। और वे ही उन आदर्शों की कीमत जानते हैं। तभी तो देश के विचार और आदर्शों की रक्षा करने के लिए अपने प्राण देकर भी वे इसे सस्ता सौदा समझते हैं। नेता जी ने कहा- हम रहें न रहें, यह देश रहना चाहिए। देशभक्तों के सामने एक आदर्श रहा, जिसने उन्हें सर्वदा शक्ति दी। वे हँसते हँसते बलिदान देते गए। उनके सामने फांसी का फंदा था, वे बेडि़याँ खनकाते, गाते गाते फांसी पर चढ़ गए। उनके सामने विष का प्याला था, उन्होंने अमृत समझकर उसका पान किया और आँखें मूंद लीं। गोलियाँ थीं, अपना सीना आगे कर दिया। कहने में यह कविता कितनी अच्छी लगती है, पर जिन लोगों ने इसका भाष्य लिखा उन लोगों के बारे में हम क्षण भर आँखें बंद कर चिन्तन करें तो ऐसा लगता है जैसे वे किसी अलौकिक दुनिया के प्राणी थे। कितनी विडम्बना है कि इस देश मेें गरीब जनता की खून पसीने की कमाई से ऐश करने वाले पाखंडियों को पूजा जाता है, उन देशभक्तों का लोग नाम भी नहीं जानते।
आखिर वह आदर्श क्या है? जिसे जिन्दा रहना चाहिए। जो निजी स्वार्थ के लिए संघर्ष करेगा वह क्यों मरना चाहेगा! मरकर उसे क्या मिलेगा? वह आदर्श था कि यह देश जिन्दा रहे। क्योंकि यह देश जिन्दा रहेगा तो धरती पर मानवता जिन्दा रहेगी। यही देश मानवता की शाश्वत परम्पराओं को सहेजे हुए है। इसी देश से दुनिया के लोग अपने अपने चरित्रों की शिक्षा लेते रहे हैं। इसी देश को विश्व सभ्यता का पालना कहा जाता है। इसी देश में दुनिया के लोग शाश्वत सुख और मानसिक शांति की तलाश में आते हैं, पर अब उन्हें सन्दीपन और बोधायन नहीं मिलते, क्योंकि हम लोग देश की परम्पराओं की रक्षा करने वालों को या तो भूल गए या फिर वर्ष में सिर्फ एक बार उनकी जय जयकार बोलते रहे, उनके आदर्शों को उपेक्षित कर दिया, बल्कि बहुत सारी खुराफाती शक्तियाँ इस देश के विचार और आदर्शों को बरबाद करने पर तुली हुईं हैं।
-सहदेव समर्पित (शांतिप्रवाह जनवरी 2016 का अंश)

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

शेष हैं कुछ काम अब भी।

चल जला पुरुषार्थ का दीपक, अरे बन राम अब भी।

शेष हैं कुछ काम अब भी।।


तारकों का पथ प्रदर्शन छोड तू खुद चॉंद-सा बन।
राह है तेरे पगों में, सामने है लक्ष्य पावन।
ठोकरों पर मत गिला कर, मुड़ न वापस तिलमिला कर,
कण्टकों को कर तिरस्कृत पग बढ़ा अविराम अब भी!!
शेष हैं कुछ काम अब भी!

कण्टकों में फूल-सा खिल, औ’ तिमिर में दीप-सा जल।
शिव बना खुद को पथिक तू, संकटों का पी हलाहल।।
ऑंधियों में जिन्दगी है, रे अगर तू आदमी है।
तो समझ ले जिन्दगी में हेय है विश्राम अब भी!!
शेष हैं कुछ काम अब भी!!

रात की काली सतह पर, लिख अरे कुछ लेख अब भी।
शेष है सुबह का तेरे, रक्त से अभिषेक अब भी।
सुबह की आशा यही है, राह की भाषा यही है,
हो ‘समर्पित’ चल-चला-चल, राह पर निष्काम अब भी।
शेष हैं कुछ काम अब भी!!

 

शनिवार, 7 सितंबर 2013

‘‘ईश्वर के न मानने में हानि’’

     प्रायः यह सुना जाता है कि अमुक व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानता और बहुत सुखी है तथा अमुक ईश्वर को मानता है, वह दुःखी  है अतः ईश्वर के मानने का क्या लाभ हुआ? यह शंका अधिकतर लोगों को घेरे रहती है। इस पर भी विचार किया जाना अति आवश्यक है। आइये, इस लेख के माध्यम से हम संक्षिप्त रूप में यह चर्चा करें कि ईश्वर को न मानने से क्या हानियां हैं। इससे आस्तिक लोगों को तो जो लाभ होगा सो होगा ही परन्तु एक तर्कपूर्ण विवेचन होने से नास्तिक लोगों को भी उतना ही लाभ होगा। यूं तो ईश्वर के न मानने से अनेकों समस्यायें/हानियां उपस्थित होती हैं परन्तु मुख्य रूप से कुछ निम्न बिन्दुओं में हमने इनको सम्मिलित करने का प्रयास किया है जिनमें सामान्य रूप से कई बातें आ जाती है।
1    कृतघ्नता:- सबसे पहली हानि तो जो ईश्वर के न मानने से होती है वह है कृतघ्नता। ईश्वर हमारे ऊपर अनन्त उपकारों की वर्षा करते हैं। अपनी दया व अनुकम्पा से अनादि काल से हम लोगों को कल्याण ही करते रहते हैं और अनन्त काल तक करते रहेंगे। आश्चर्य इस बात का है कि इसके बदले में वे हमसे लेते कुछ भी नहीं। जबकि संसार में यदि कोई हमारा थोड़ा सा भी कार्य कर देता है या हम पर कोई उपकार करता है तो उसके बदले में हमसे कुछ  न कुछ चाहता अवश्य है। मान लो कि कोई ऐसा भी है कि जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता तो वह भी हमारा कार्य केवल उस समय तक करता है जब तक कि हमारी विचारधारा का उससे टकराव न हो। और जहां विचारधारा मंे भिन्नता आई, उसे हमारा शत्रु बनने में भी देर नहीं लगती। परन्तु ईश्वर का उपकार इस कोटि का नहीं है। चाहे हम आस्तिक हों या नास्तिक वह कभी हमारा न तो शत्रु बनता न अपने उपकारों का कोई बदला चाहता और न ही उन्हें करना बन्द करता है। हमारी सब आवश्यकतायें उसी की सहायता से पूर्ण होती हैं। उसकी सहायता के बिना हम एक पग भी नहीं उठा सकते फिर भी यदि उसके उपकारों को या उसे न माने तो कृतघ्नता का महा-पाप हमें लगता है। शास्त्रकारों ने जहां अन्य पापों का प्रायश्चित माना है, वहीं कृतघ्नता को ऐसा पाप माना है कि जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं है। कृतज्ञ होना मनुष्यों का महान गुण है और कृतघ्न होना महान दोष या पाप। विचार कीजिए कि यदि ईश्वर हमें शरीर देता और उसकी आवश्यकता की पूर्ति हेतू अन्य साधन न देता तो हमारी क्या दशा होती? हम उसका क्या बिगाड लेते? परन्तु आश्चर्य है कि यूं तो हमारा कोई छोटा सा भी कार्य कर देता है तो हम उसका गुणवान करते फिरते हैं और जो नित्य निरंतर हम पर अनन्त कृपायें बरसाता रहता है, बिन मांगे सब कुछ देता जाता है, उसे जानते तक नहीं, अपितु सदैव उसकी अवहेलना ही करते जाते हैं। क्या इस दोष का कोई मूल्यांकन कर सकेगा। भगवान को न मानने से जो पाप हमें लगा उसका भला हम कोई सुधार कर पायेंगे? क्या यह मनुष्यता है?
2    दूसरी हानि है किसी भी पदार्थ का निर्माण न हो पाना:-  मान लीजिये कि कोई ऐसा नीरस शुष्क एवं केवल भौतिकवादी बुद्धिजीवी है कि जो न तो भगवान को मानता है और न ही कृतज्ञता को मानता है। यह संसार को केवल एक लेन-देन की मण्डी मानता है। यह मानता है कि बिना लिये दिये यहां का कार्य नहीं चलता। मात्र लेन-देन ही संसार का आधार है। ठीक है,  कोई कुछ भी मानने में स्वतंत्र है जिसका जैसा जी चाहे मानें। परन्तु विज्ञान को तो मानना ही पडेगा। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक दोनों ही इसे स्वीकार करते हैं। अपितु नास्तिक इसे अधिक स्वीकार करता है। वह यह मानता है कि संसार परमाणुओं के मिलने से हुआ है। परमाणुणों के मिलन का नाम रचना है और बिखरन का नाम विनाश है। सब ग्रह उपग्रह परस्पर आकर्षण में बंधे हुए नियम से कार्य कर रहे है। ‘बिग बैंग’ से परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई और उनके मेल से धीरे-2 पदार्थों का निर्माण होता चला गया। ठीक है! हम थोडी देर के लिए उनके इस विचार से सहमति रखते हैं। परन्तु विज्ञान को विज्ञान की ही दृष्टि से देखना चाहिए, मूर्खता की दृष्टि से नही। ऐसा नहीं है कि विज्ञान में सब कार्य चमत्कारी ढंग से पूर्ण होते हैं। स्मरण रखिये कि विज्ञान में एक क्रमबद्धता (वतकमत) होती है और सब कार्य एक निश्चित क्रम में एक नियम के अनुसर करते हैं। यदि रत्ती भर भी उस नियम का भंग होगा तो कार्य कभी सम्पन्न नहीं हो सकेगा। संसार के सभी भौतिकवादी इसे एक मत से स्वीकार करते हैं। विज्ञान के जितने भी कार्य आपको दिखाई देते हैं वे सभी इसी नियमबद्धता पर आधारित हैं। अब विचार करना चाहिये कि क्या नियम कभी बिना नियामक के बन सकता है?  क्या नियम स्वयं बन जाते हैं? सड़क पर बाई ओर लोग अपने आप चलने लग गये या किसी ने ऐसा करने के लिए कहा? बाजार में अधिक वाहनों आदि के होने से भीड़ होने पर लाल बत्ती होने पर रूकने एवं हरी होने पर चलने का नियम स्वयं बन गया था या किसी ने बनाया? नियम कभी भी बिना नियामक के नहीं बनता। नियामक की यह विशेषता है कि वह कहीं भी, कुछ भी अपने नियमों को नहीं बदलता, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कठिनाई का सामना क्यों न करना पडे। इसलिए यदि आप विज्ञानवादी हैं और यह  मानते हैं कि नियम बनाने वाला कोई नहीं तो इस बात को अपने मन से निकाल दीजिये कि नियम स्वयं बनते हैं। अरे! जब सड़क पर चलने का साधारण सा नियम भी स्वयं नहीं बनता तो पदार्थों के निर्माण का महान कार्य क्या कभी बिना कर्ता के हो सकता है?
    दर्शन एवं विज्ञान दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। वैशेषिक दर्शन का ऋषि कहता है - ‘कारण अभावात् कार्य अभावः।’ अर्थात् कारण नहीं होगा तो कार्य नहीं होगा। यह एक सर्वतन्त्र सिद्धांत है। न्दपअमतेंस ज्तनजी है जो कहीं भी, कभी भी कुछ भी नहीं बदलता। जैसे पृथ्वी घूमती है इसे सब स्वीकार करते हैं। वैसे यह भी सिद्धांत है कि बिना कारण के कार्य नहीं होता। अब कारण कितने हैं? भारतीय वैज्ञानिकों, अपितु वैदिक विद्वानो ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है। उपादान कारण वह कि जिससे वस्तु बनती है जैसे कि घड़ा मिट्टी से मेज लकडी से और तलवार लोहे से बनती है। जब तक मिट्टी लकडी एवं लोहा नहीं होगा तब तक घड़ा मेज व तलवार नहीं बन सकते। दूसरा है साधारण कारण वह कि बनाने के साधन, घड़ा बनाने के लिये चाक, दण्ड, पानी एवं समय की, मेज बनाने के लिए कुल्हाडी रन्दा, कीलें आदि की और तलवार बनाने के लिए भट्ठी, हथौड़ा, अग्नि आदि की आवश्यकता है। समय तो सामूहिक रूप से सबमें लगता ही है। अब मिट्टी है, चाक है, दण्ड है, पानी है और कुल्हाडी रन्दा, कीले, भट्ठी हथौडा अग्नि आदि सभी कुछ है, परन्तु बनाने वाला कुम्हार, बढ़ई और लौहार नहीं है तो क्या ये सब वस्तुऐं अपने आप बन जायेंगी? कदापि नहीं, यही तीसरा कारण कारण निमित्त कारण कहलाता है।  ये वे तीन परम आवश्यक साधन हैं जिनके बिना कभी कोई पदार्थ या रचना संभव ही नहीं है। अतः इस स्थिति में नास्तिक लोगों का यह कहना ठीक नहीं है कि संसार मात्र परमाणुओं के मेल से स्वयं बन गया। नहीं-2 उपादान कारण प्रकृति, साधारण कारण-समय आदि और निमित्त कारण स्वयं ईश्वर के बिना सृष्टि रचना की कल्पना ही व्यर्थ है। यहां एक शंका यह हो सकती है कि जैसे कुम्हार को घड़ा बनाने के लिए चाक, दण्ड पानी आदि की आवश्यकता है तो क्या ईश्वर को भी इस प्रकार के बाहरी साधनों की आवश्यकता थी
 जी नहीं! ईश्वर का कार्य बाहरी रूप से पदार्थों का निर्माण करने का नहीं है। बाहरी साधनों की आवश्यकता अल्प शक्ति वालों एवं स्थूल शरीर वालों को रहती है। सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, एवं परम सूक्ष्म ईश्वर को नहीं। वह तो परमाणुओं के भीतर भी व्यापक है और बाहर भी अतः उसे कार्य करने के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता ही नहीं है। वह अन्दर से अपना कार्य करता है। स्मरण रखिये ईश्वर का कार्य घड़ा, मेज या तलवार बनाना नहीं है अपितु मिट्टी, लकड़ी या लोहा (वह भी सूक्ष्म अवस्था में) बनाना है जो मनुष्य नहीं बना सकता।
    अब यदि आप ईश्वर को नहीं मानते तो विज्ञान का सारा दुर्ग एक फूक में उड़ जायेगा। अतः यह कहना कि परमाणुओं में गति आने से सब पदार्थों का निर्माण स्वतः ही हो गया, मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वेद मंत्र स्वयं कहता है- हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। संसार की उत्पत्ति से पूर्व प्रकृति भी थी और उसको गति देने वाला उसका स्वामी ईश्वर भी था। अतः यदि ईश्वर को न मानें तो यह महान् समस्या उत्पन्न हो जायेगी कि कोई भी पदार्थ बन नहीं सकेगा।
3    ज्ञान का अभाव: तीसरी महान् हानि होगी प्राणियों में और विशेष रूप से मनुष्यों में ज्ञान का अभाव होगा। ज्ञान दो प्रकार का है एक स्वाभाविक, दूसरा नैमितिक। स्वाभाविक ज्ञान जो पशुओं आदि है, इसमें कोई बहुत अधिक परिवर्धन नहीं किया जा सकता। हां! सामान्य रूप से उसका उपयोग हम अपने अनुसार करने योग्य उन्हें मोड़ लेते हैं परन्तु मनुष्यों का ज्ञान इससे भिन्न है। यह बढ़ाने से बढ़ जाता है और घटाने से घट जाता है। यदि सृष्टि के आरंभ में, ईश्वर मनुष्य को ज्ञान (वेद) न देता तो यह कभी भी ज्ञानवान नहीं बन सकता था। जो लोग (विशेष रूप से विकासवादी) यह कहते हैं कि मनुष्य में ज्ञान का उदय धीरे-2 हुआ, आरंभ में वह निरा जंगली ही था अपितु पशु ही था, वे बहुत बडी भूल में पडे हैं। उदाहरण के रूप में हमने अपने शिक्षकों से, गुरूओं से शिक्षा पाई, उन्होंने अपने गुरूओं से और उन्होंने अपने गुरूओं से। यह क्रम पीछे की और चलते-2 एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जहां पर शिक्षा देने वाला कोई भी गुरू नहीं बचता। उस समस्या का समाधान संसार का महानतम आस्तिक ऋषि, पंतजलि करता है। वह कहता है ‘ स पूर्वेषामापि गुरू कालेनानवच्छेदात् (योग 1/26) वह गुरूओं का भी गुरू है जिसको काल भी बाधित नहीं कर सकता। विकासवादी कहता है कि मनुष्य का विकास बन्दर से हुआ और धीरे-2 उसके ज्ञान में वृद्धि हुई। प्रथम तो इस विचार में ही अनेकों भ्रांतियां हैं फिर भी यदि यह मान लिया जाये कि मनुष्य का विकास बन्दरों से हुआ तो फिर ज्ञान का उदय होना, वह भी उतनी उच्च कोटि का यह नितांत असंभव है। बाहर की परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हांे, उससे केवल इतना तो प्रभाव पड़ सकता है कि उससे प्राणियों का बाह्य रंग रूप कुछ बदल जाये या उनका खान पान बदल जाये परन्तु यह संभव नहीं है कि उनमें आमूल चूल परिवर्तन इस सीमा तक हो जाये कि जिससे उनकी समूची जाति ही बदल जाये और वह अपना विकास इस सीमा तक कर ले कि ज्ञान का उदय उसे धरा से गगन तक बढ़ा दे। बन्दरों का स्वभाव तो क्रूर, लड़ने झगड़ने एवं छीना झपटी का है। मनुष्य में यह संवेदना, एक दूसरे से सहयोग की भावना कहां से आ गई? ज्ञान भी ईश्वर प्रदत्त है। यदि ईश्वर को न मानें तो फिर आदि में ज्ञान का अभाव होने से मनुष्य अज्ञानी ही रहेगा।
4    कर्मफल व्यवस्था का भंग होना: एक महान् समस्या और भी है वह है कर्मों का उचित फल न मिलने से अन्याय का होना। हम जो भी कर्म करते हैं उनका अच्छा या बुरा फल कर्मानुसार अवश्य मिलता है। यह एक अटल व्यवस्था है जिसके सहारे संसार चलता है और न्याय व्यवस्था जीवित रहती है। मनुष्यों ने भी समाज को ठीक से चलाने के लिए, लोगों की सुरक्षा एवं समृद्धि के लिये दण्ड व्यवस्था या न्याय व्यवस्था का निर्माण किया। यदि व्यक्ति को उसके कर्मों का फल ठीक से न मिले तो निरा जंगली हो जायेगा। उस दशा में समाज में इतनी भयानक स्थिति उत्पन्न हो जायेगी कि हम एक दिन भी न तो सुख से जीवित रह पायेगें और न ही किसी प्रकार की उन्नति ही संभव हो पायेगी। कारण! कि जब बुरे कर्म का फल दुःख रूप में, दण्ड रूप में नही मिलेगा तो कोई अच्छा कर्म करेगा ही क्यों? इसलिए जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है और फल भोगने में परतन्त्र। अर्थात् फल वह ईश्वरीय व्यवस्था से पाता है। कोई अपने बुरे कर्म का फल दुःख या दण्ड स्वयं ही क्यों भोगना चाहेगा?
5    दयालुता का अभाव एवं हिंसा की वृद्धि: अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य मंे कुछ विशेष ईश्वर ने दिया है। वह है दूसरे प्राणियों के प्रति दया का भाव यह भी ईश्वर प्रदत्त है। अन्य प्राणी दया करना नही जानते, वे तो अपना पेट भरने के लिए दूसरों को मार कर खा जाते हैं। परन्तु मनुष्य में कुछ विशेष भाव ईश्वर ने संभवतः इसलिये भरा है कि मनुष्य सारे संसार का स्वामी भी है और श्रेष्ठ भी है। स्वामी का स्वामित्व और श्रेष्ठ की श्रेष्ठता इसी में है कि वह दूसरों पर दया करे। यदि दया का भाव न होगा तो फिर हिंसा की वृद्धि होकर सब एक दूसरे के शत्रु बन के लड मरेंगे। यह संवेदना, यह दया बिना ईश्वर के संभव नहीं है। अपने पैर में कांटा चुभने पर पीड़ा की अनुभूति होना ज्ञान है परन्तु दूसरे के पैर में पीड़ा होने पर उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़ना यह ज्ञान का नहीं संवदेना का दया का कार्य है। मनुष्यों में जिस दिन यह भाव समाप्त हो जायेगा उस दिन मनुष्य जाति भी समाप्त हो जायेगी। अतः ईश्वर को न मानने से यह दोष भी उत्पन्न हो जायेगा।
6    सृष्टि का संचालन न हो पाना: ईश्वर सृष्टि को उत्पन्न ही नहीं करता अपितु वह उसका ठीक ढंग से संचालन भी करता है। स्मरण रखना चाहिए कि जब हम सृष्टि के बात करते हैं तो उसमें यह सब कुछ आ जाता है जो हमें दिखाई देता है और नहीं दिखाई देता है। मनुष्य, पशु, पक्षी, जंगल, नदियां, पहाड़, ग्रह, उपग्रह, वायु, जल, अग्नि आदि समस्त वस्तुऐं। आज हम यह जान चुके हैं कि सब ग्रह उपग्रह गुरूत्वाकर्षण की शक्ति में बंधे अपनी-2 धुरी पर घूम रहे हैं। कोई भी किसी से टकराता नहीं है। पृथ्वी को ही ले लीजिये। कितनी भारी, कितनी विशाल है यह। इस पर क्या-2 नहीं है? फिर यह घूमती भी है वह भी इतनी व्यवस्था से कि हमंे घूमना अनुभव भी नहीं होता। क्या यह व्यवस्था धरती के सारे मनुष्य मिल कर सकते हैं? कितना हास्यास्पद लगता है ना। परन्तु ईश्वर मात्र हमारी धरती को ही नहीं अपितु अनगिनत ब्रह्माण्डों को धारण करता है और उन्हें घुमाता भी है उनका संचालन भी करता है। एक पल को भी यदि वह इस कार्य को न करे तो हमारा क्या हाल होगा हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अपने घर के संचालन हेतु हम क्या-2 कार्य नही करते दिन रात इसमें लगे रहते हैं, फिर गांव का संचालन फिर नगर का प्रान्त का देश और विश्व की व्यवस्था के संचालनार्थ कितनी समितियां, सभायें, संस्थाये कार्य कर रही हैं विचार कर देशो। जब साधारण से साधारण कार्य को दक्षतापूर्वक संचालन की आवश्यकता है तो फिर सृष्टि का कार्य बिना संचालक के चल सकेगा? ईश्वर के न मानने वाले तनिक विचारें।
7     सृष्टि का प्र्रलय: उत्पत्ति के लिये, संचालन के लिये तो ईश्वर की आवश्यकता समझ में आती है परन्तु प्रलय? प्रलय क्या होना चाहिए? बनाना तो समझ में आ गया परन्तु बिगाड़ना भी आवश्यक है क्या? हां ! उतना ही आवश्यक है जितना कि बनाना। आपने बहुत सुन्दर, सुदृढ़ एवं सुखमय साधनों वाला भवन बनाया। आप उसमे रहे, फिर आपके बच्चे रहे। परन्तु समय के साथ-2 वह भी खण्डित होता चला गया। जब आपके पौत्र एवं प्रपौत्र उसमें रहने लगे तो उन्होंने क्या देखा कि दीवारों में जगह-2 दरारें पड़ चुकी थी, छत भी जर्जर हो गई थी, फर्श भी उखड़ने लगे थे, अब उसमे रहना सरुक्षित नहीं रहा। वे तुरंत उसे छोड कर अन्यत्र जा बसते हैं और उसका नये सिरे से निर्माण करते हैं। निर्माण करने के लिए उस भवन का गिराना, उसको तोड़ना उसका विनाश करना आवश्यक है। जब आयु  पूरी हो गई तो फिर प्रलय या विनाश अत्यन्त आवश्यक है। विज्ञान के अनुसार उंजजमत बंद दवज इम बतमंजमक दवत कमेजतवलमक अर्थात् कोई तत्व न तो बनाया जा सकता और न ही उसका विनाश किया जा सकता है। जब यह सृष्टि भी अपनी आयु पूरी करने के उपरान्त उपयोग के योग्य नहीं रहती तो फिर इसका प्रलय भी ईश्वर आपने सामर्थ्य से करता है। यदि ईश्वर को न मानेंगें तो यह दोष भी आ जायेगा कि सृष्टि का प्रलय न होगा।
    इसके अतिरिक्त अन्य भी कई बिन्दु हो सकते हैं परन्तु वे लगभग सभी उक्त बिन्दुओं के अन्तर्गत आ जाते हैं। अब मात्र यह प्रश्न बचता है कि यदि हम ईश्वर को न मानें तो वह हमारा क्या बिगाड़ लेगा। यह प्रश्न सम्भवतः हम इसलिए उठाते हैं कि समाज में या राज्य व्यवस्था में जब हम किसी विधि विधान को नहीं मानते या कार्यक्षेत्र में अपने अधिकारी की नहीं मानते तो प्रत्यक्ष रूप में हमे दण्ड भुगतना पड़ता है। वह इसलिए है कि हम उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का उनकी व्यवस्था का एक साधन हैं। परन्तु ईश्वर के विषय में ऐसा नहीं है। हम ईश्वर की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। उसे हमारी आवश्यकता नहीं है, हमें उसकी आवश्यकता है। यदि हम ईश्वर को न मानेंगे तो जिन गुणों की उपलब्धि उससे हमें होनी है वह न होगी और हमारा समाज, हमारा जीवन बिगड़ जायेगा। राज्य व्यवस्था में इसके विपरीत है। राज्य अपनी सब आवश्यकताओं के लिए हम पर निर्भर है, जहां भी उसकी आवश्यकता में नियम में बाधा पहंुचेगी वह दण्ड देगा। हम न तो ईश्वर की आवश्यकता में बांधा पहुंचा सकते हैं और न ही उसका नियम भंग कर सकते हैं अतः वह कभी भी कुपित होता ही नहीं है। वह मात्र हमारे कर्मों का साक्षी है और जैसा कर्म वैसा प्रदाता है। अतः बिगाड़ने का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। यह उल्टी व्यवस्था होने के कारण यदि हमें सुख चाहिये, शांति चाहिये, आपसी प्रेम, सौहार्द का वातावरण चाहिये आत्मिक उत्थान चाहिये तो हमें उसे मानना ही पडेगा। एक बात और कि कोई ईश्वर को नहीं मानता तो सुखी है या ईश्वर को न मानता है और सुखी है। यह ईश्वर को मानने या न मानने के कारण नहीं है। कभी किसी ने अच्छे कर्म किये तो उनका फल भोग रहा है और किसी ने बुरे कर्म किये तो उनका भी फल भोग रहा है। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि ईश्वर का सच्चा भक्त ईश्वरीय व्यवस्था को जानकर कभी दुःख में भी धैर्य नहीं छोड़ता न उसका शोक मनाता है अपितु हंसते-2 सब कुछ सहन कर लेता है और दूसरी ओर नास्तिक जो भौतिक सुख साधनों से सम्पन्न होने पर भी तनिक सी आपत्ति में भी धैर्य खोकर महान् कष्ट उठाता है और आत्महत्या का घृणित कार्य भी कर डालता है। भौतिक साधनों की उपलब्धि/अभाव किसी के सुख एवं दुःखी होने का प्रमाण नहीं है।
रामफलसिंह आर्य शांतिधर्मी मासिक सितम्बर 2013

बुधवार, 17 जुलाई 2013

सिद्धि के लिए सच्चे साधन

सिद्धि के लिए सच्चे साधन

-स्वामी श्रद्धानन्द जी


यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वर्तते कामचारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति, न सुखं न परां गतिम्।। गीता 16/3


शब्दार्थ- (यः) जो मनुष्य, (शास्त्रविधिम्) शास्त्र की विधि एवं आदेश को (उत्सृज्य) छोड़कर (कामचारतः वर्तते) अपनी इच्छानुकूल आचरण करता है, (सः सिद्धिं न अवाप्नोति) वह न तो सिद्धि या सफलता को प्राप्त कर सकता है (न सुखम्) न सुख को, (न परां गतिम्) और न मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।
    उपदेश- जन्म दिन से ही बालक के निर्माण साधनों की आवश्यकता को न केवल आर्य ऋषियों ने ही अनुभव किया है, बल्कि संसार के सब विद्वानों ने संस्कारों की महानता के आगे सिर झुकाया है। जो मनुष्य संस्कार सम्पन्न नहीं हैं, वह मनुष्य जीवन के उच्च आदर्श की तरफ एक कदम भी नहीं बढ़ा सकता। दुःखों से छूट कर शान्त अवस्था को प्राप्त करना, मनुष्य जन्म का परम उद्देश्य है। किन्तु दुःखों से मनुष्य छूट कैसे सकता है? जब तक कि सुख प्राप्ति के साधनों का उसे ज्ञान न हो। इसलिए कृष्ण भगवान् ने सिद्धि, सुख और मुक्ति का क्रम से वर्णन किया है। किन्तु सिद्धि के लिए साधनों की आवश्यकता है। उन साधनों की वास्तविकता मनुष्य कहाँ से जाने?
    इसी बीसवीं शताब्दी के विद्वान् नौजवान अपने दिमाग से निकले हुए विचारों के समर्थन को ही प्रकृति का समर्थन समझते हैं, किन्तु इन नवयुवकों पर ही क्या निर्भर है? हर समय प्रत्येक देश, प्रत्येक समुदाय के अनुभव-शून्य नवयुवक इसी तरह अपनी बुद्धि पर निर्भर करना ही सिद्धि का साधन समझा करते हैं और जब तक कि संसार के अन्दर सच्ची शिक्षा का अभाव है, तब तक बराबर इसी तरह समझा करेंगे। अशिक्षित आत्मा साधनों की वास्तविकता को समझ नहीं सकता, क्योंकि जब उसे सुख के स्वरूप का ही ज्ञान नहीं है, तो वह सुख के साधनों का सच्चा चित्र अपने लिए कब खींच सकता है? इसलिए मनु भगवान् ने धर्म शास्त्र का उपदेश देते हुए बतलाया है कि मुक्ति के साधनों को जानने का सबसे छोटा और श्रेष्ठ साधन मनुष्य का अपना आत्मा है।
    जीवात्मा की हालत ठीक दर्पण की तरह है। जिस कदर एक शीशा अधिक साफ किया जावे उसी कदर सफाई के साथ वस्तुओं का प्रतिबिम्ब उसके अन्दर पड़ता है और उसी कदर सच्चाई के साथ उन चीजों की बाह्य स्थिति देखने वालों के लिए प्रकट कर सकता है, परन्तु यदि शीशे पर मैल व मिट्टी आदि से उसका रूप धुंधला पड़ जाये तो उसके अन्दर वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बिल्कुल उल्टा पड़ेगा। इसी तरह जो जीवात्मा अशक्त है, बिगड़ते-बिगड़ते अविद्या का बिल्कुल शिकार हो जाता है। उसके लिए उसका अपना प्रकाश कुछ भी मार्गदर्शक का काम नहीं कर सकता। यदि उसकी शिक्षा ठीक हो तो वह केवल ठीक रास्ते का पता लगाने वाला बन जाता है। आगे चलने के लिए उसे फिर दूसरे पवित्र आत्माओं से शिक्षा लेने की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु दूसरे पवित्र आत्मा भी एक निश्चित सीमा तक मार्ग प्रदर्शन कर सकते हैं। कभी-कभी ईर्ष्या या द्वेष में फँसकर सदाचारी पुरुषों का आचार भी धोखा देने वाला सिद्ध होता है, तब शास्त्र के मार्ग दिखाने की आवश्यकता होती है।  
    जब कि बड़े-बड़े आत्मा भी सर्वज्ञ नहीं, इसलिए उनकी लिखी हुई शिक्षायें (जो उनके बनाए शास्त्रों में लिखी हैं) भी पूरा-पूरा मार्ग प्रदर्शन का काम नहीं दे सकतीं। तब पूर्ण शास्त्र की ढूँढ होती है और वह परमेश्वर का निर्भ्रान्त और अनन्त ज्ञान = वेद है।
    हे मनुष्य! उस अनन्त और निर्भ्रान्त ज्ञान को ढूँढ कर और उसे पाकर उसमें वर्णन की हुई बुद्धि के साँचे में अपने जीवन को ढ़ाल। फिर तेरे लिए मुक्ति का मार्ग बिल्कुल सुगम हो जाएगा। वह पूर्ण शास्त्र कहाँ है और उस वेद ईश्वरीय ज्ञान की कहाँ खोज करें ? यह प्रश्न किस मनुष्य के हृदय में कभी न कभी नहीं उठता? इसका उत्तर देने का भी किसी न किसी समय यत्न किया है। यह प्रश्न जैसे मनु भगवान के समय नवीन था, वैसा अब भी है। जब तक प्रश्न का ठीक उत्तर नहीं मिलता तब तक मनुष्य का हृदय डांवाडोल रहता है। जगत् पिता अपनी कृपा से हम सबके हृदयों को हिला देवे जिससे हम उसके सच्चे ज्ञान को ढूँढ करके अपने जीवन की सिद्धि के लिए सच्चे साधन जानकर सच्ची शान्ति की ओर पग उठायें।

-शांतिधर्मी नवम्बर 2005

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

    ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा

लेखक: चन्द्रभानु आर्य

जिस मानव संस्कृति या भारतीय संस्कृति का हम महिमा मण्डन करते हैं, उसकी अन्यतम विशेषता यह है कि यह मानव के व्यक्तिगत चरित्र निर्माण पर केन्द्रित है। भारतीय संस्कृति को इस मानव संस्कृति की प्रतिनिधि के रूप में इसलिए सम्मान दिया जाता है क्योंकि भारतवर्ष के लोगों ने बहुत बड़े बड़े सांस्कृतिक झंझावातों के बीच में भी अपना सब कुछ देकर भी अपनी इस सांस्कृतिक थाती को बचाकर रखा। तभी तो बहुत काल तक इस देश के लोगों के चरित्र को आदर्श मानकर दुनिया के लोग अपने जीवन को सार्थक बनाते रहे।  एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवाः। आदि सम्राट् महाराज मनु का यह स्पष्ट निर्देश पृथिवी के समस्त मानवों के लिए था। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत के लोगों ने धन खोया, जन खोया, लेकिन चरित्र नहीं खोया। भारतवर्ष में ही क्या जब भी संसार में कोई विपत्ति आई तो उसके मूल में मनुष्य की अपनी आत्महीनता और चारित्रिक न्यूनताएँ थीं। जब समाज के पथ निर्धारक लोग चारित्रिक दुर्बलताओं का शिकार हो गए तो प्रत्येक क्षेत्र में गरिमा की हानि हुई। चारित्रिक दुर्बलताओं के कारण संभा जी जैसे राजपुत्र शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित दृढ़ आर्य साम्राज्य के विनाश का कारण बन गए और इसी बल के कारण महाराणा प्रताप जैसे नरपुंगव अपने समय के सर्वाधिक शक्तिशाली आक्रमणकारियों को टक्कर दे सके। जब से व्यक्तिगत चरित्र को उपेक्षित किया गया तब से यह देश वह न रहा जिससे विश्व के लोग प्रेरणा ले सकते। स्थिति यहाँ तक पहुंची कि सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य का दावा करने वाले भारतपुत्र सदियों तक गुलाम रहे और आज भी उन दुर्बलताओं और हीनताओं से उभर नहीं सके।
    इस संस्कृति में अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़कर अन्य स्त्रियों को माता का स्थान दिया गया। मातृवत् परदारेषु--। जब शिवाजी महाराज का सेनापति एक शत्रु की पुत्रवधु को पकड़कर लाया तो शिवाजी महाराज का सिर अपने सेनापति के कृत्य पर झुक गया। उन्होंने अपने नादान सेनापति के कृत्य पर क्षमायाचना करते हुए उस नवयौवना को माता कहकर उसके शिविर में वापस लौटा दिया। कारागार में दुर्गादास राठौर के पास जब गुलेनार ने आकर उसे भ्रष्ट करना चाहा तो वीर सेनानी की असली वीरता की परीक्षा हुई, जब उसने मृत्यु की धमकी को सुनकर भी अपने चरित्र की रक्षा की। काशी में जब शास्त्रार्थ में अपराजेय स्वामी दयानन्द को गिराने के लिए एक कन्या को षड़यंत्रपूर्वक भेजा गया तो उसने कहा कि मैं आप जैसा पुत्र चाहती हूँ। इस पर आदित्य ब्रह्मचारी ने कहा कि आप मेरी माता हैं आप मुझे ही अपना पुत्र समझ लीजिए। यही चारित्रिक बल था जिसके कारण सारा विश्व भारत के सामने सर झुकाता रहा। जब पतन हुआ तो इतना हुआ कि विश्व को ब्रह्मचर्य की संजीवनी की शिक्षा देने वाले देश को आज एक विदेशी व्यापारी एड्स जैसी कुख्यात बिमारियों से बचने के तौर तरीके सिखा रहा है। संयम और सदाचार की शिक्षा देने के स्थान अश्लीलता और चरित्रहीनता का प्रचार बढ़ाकर देश के कर्णधारों ने अपने पांवों पर आप कुल्हाड़ी मारी है। पाश्चात्य अपसंस्कृति के जहर ने पीढ़ी को लील लिया है। उसको चरित्र की शिक्षा देने वाला कोई नहीं रहा। आज हमारे फौजियों का उत्साह बढ़ाने के लिए सीमाओं पर नर्तकियाँ और अभिनेत्रियाँ भेजी जाती हैं। नारी स्वतंत्रता के नाम पर चरित्रहीन लोगों ने नारी को मात्र भोग्या बना दिया है। टी0 वी0 चैनलों की होड़ ने नारी की गरिमा को इतना गिरा दिया कि उसका माता का स्थान तो एक कल्पना की वस्तु बन गया। आज जबकि इस अंधता के परिणाम भी मिलने शुरु हो गये हैं, इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा। आज भी इन भयंकर रोगों से बचने के लिए संयम और सदाचार की शिक्षा नहीं दी जा रही, अपितु दुराचार के नए नए तरीकों का प्रचार किया जा रहा है। चरित्रहीनता के पोषक अभिनेता अभिनेत्रियों को प्रोत्साहित और सम्मानित किया जा रहा है और चरित्र की रक्षा के लिए ब्रह्मचर्य की शिक्षा को आज भी शिक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं है। यदि ब्रह्मचर्य पर आधारित प्राचीन शिक्षा प्रणाली को पुनः प्रतिष्ठित किया जावे तो देश की जवानी  इन महाभयंकर बिमारियों से बच सकती है। स्वामी रामदेव का कथन ठीक ही है कि देश को सैक्स शिक्षा की नहीं, योग शिक्षा की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय संविधान के अनुसार व्यभिचारी स्त्री और पुरुषों को लोहे का पलंग लाल करके मृत्यु दण्ड दिया जाता था, आज उन्हें पद्म भूषण दिये जा रहे हैं। स्वामी दयानन्द कहते हैं कि लड़कियों का विद्यालय लड़कों के विद्यालय से कम से कम दो कोस की दूरी पर हो। लड़कियों के विद्यालय में पांच साल का लड़का भी न जाने पावे और लड़कों के विद्यालय में पांच साल की लड़की भी न जाने पावे।  आज देश को बिजली पानी से भी अधिक ब्रह्मचर्य की शिक्षा की आवश्यकता है। इसके अभाव में ही सारी दुर्बलताएँ, रोग और क्लीवता फैल रही है। राम के बेटे पोते आज सब कुछ होते हुए भी दीन हीन अवस्था में जीवन यापन कर रहे हैं। यदि हमें राष्ट्र अभिमान और आत्म गौरव की रक्षा करनी है तो इसका एक ही रास्ता है- ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा।    -चन्द्रभानु आर्य                    

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

नारी विदुला सी महतारी,
अरिदल पर पड़ जाती भारी।
बनकर के तलवार देश की,
करती मारो मार देश की।
धरकर रूप महाकाली का,
लेकर दोनों हाथ दुधारी।
कूद पड़ी जब महासमर में,
बेटा अपना बांध कमर में!
भगदड़ मच गई शत्रु दल में,
अतुलित नारी साहस बल में!!

किसी तरह बलहीन नहीं है,
सबला है यह दीन नहीं है।
देश प्रेम का भाव हमेशा,
अन्तस् में अविरल बहता है।
तुम सबला हो वीर प्रसू हो,
कौन तुम्हें अबला कहता है!!

-समर्पित (‘राष्ट्र-उत्थान’ महाकाव्य से)

मंगलवार, 5 मार्च 2013

माटी 

यह माटी कितनी पावन है 

ये माटी ही तो चन्दन है. 


यह माटी जीवन देती है 

यह माटी तो खुद जीवन है. 


वीर शहीदों के शोणित से,

महका माटी क़ा कण कण है. 


देश की माटी सिर माथे पर,

इस माटी का अभिनन्दन है.

-समर्पित