गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

यह देश जिन्दा रहेगा तो धरती पर मानवता जिन्दा रहेगी।
जो लोग अपने देश और धर्म पर बलिदान दे देते हैं, क्या उन्हें अपने जीवन के मूल्य का अनुमान नहीं होता? वास्तव में जो अपने आदर्शों के लिए जीवन की आहुति दे देते हैं, जीवन का मूल्य तो वही जानते हैं। और वे ही उन आदर्शों की कीमत जानते हैं। तभी तो देश के विचार और आदर्शों की रक्षा करने के लिए अपने प्राण देकर भी वे इसे सस्ता सौदा समझते हैं। नेता जी ने कहा- हम रहें न रहें, यह देश रहना चाहिए। देशभक्तों के सामने एक आदर्श रहा, जिसने उन्हें सर्वदा शक्ति दी। वे हँसते हँसते बलिदान देते गए। उनके सामने फांसी का फंदा था, वे बेडि़याँ खनकाते, गाते गाते फांसी पर चढ़ गए। उनके सामने विष का प्याला था, उन्होंने अमृत समझकर उसका पान किया और आँखें मूंद लीं। गोलियाँ थीं, अपना सीना आगे कर दिया। कहने में यह कविता कितनी अच्छी लगती है, पर जिन लोगों ने इसका भाष्य लिखा उन लोगों के बारे में हम क्षण भर आँखें बंद कर चिन्तन करें तो ऐसा लगता है जैसे वे किसी अलौकिक दुनिया के प्राणी थे। कितनी विडम्बना है कि इस देश मेें गरीब जनता की खून पसीने की कमाई से ऐश करने वाले पाखंडियों को पूजा जाता है, उन देशभक्तों का लोग नाम भी नहीं जानते।
आखिर वह आदर्श क्या है? जिसे जिन्दा रहना चाहिए। जो निजी स्वार्थ के लिए संघर्ष करेगा वह क्यों मरना चाहेगा! मरकर उसे क्या मिलेगा? वह आदर्श था कि यह देश जिन्दा रहे। क्योंकि यह देश जिन्दा रहेगा तो धरती पर मानवता जिन्दा रहेगी। यही देश मानवता की शाश्वत परम्पराओं को सहेजे हुए है। इसी देश से दुनिया के लोग अपने अपने चरित्रों की शिक्षा लेते रहे हैं। इसी देश को विश्व सभ्यता का पालना कहा जाता है। इसी देश में दुनिया के लोग शाश्वत सुख और मानसिक शांति की तलाश में आते हैं, पर अब उन्हें सन्दीपन और बोधायन नहीं मिलते, क्योंकि हम लोग देश की परम्पराओं की रक्षा करने वालों को या तो भूल गए या फिर वर्ष में सिर्फ एक बार उनकी जय जयकार बोलते रहे, उनके आदर्शों को उपेक्षित कर दिया, बल्कि बहुत सारी खुराफाती शक्तियाँ इस देश के विचार और आदर्शों को बरबाद करने पर तुली हुईं हैं।
-सहदेव समर्पित (शांतिप्रवाह जनवरी 2016 का अंश)

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